आज फिर सुबह का सूरज अपनी यात्रा पूरी करते-करते पश्चिम में कहीं खो गया और सांझ चुपचाप रात में बदल गई। दिन तो काम, दोस्तों और घर-परिवार के बीच कब बीत गया, पता ही नहीं चला।
लेकिन जैसे-जैसे रात गहराती गई, धुंधली और खोई हुई यादें एक-एक करके स्पष्ट होने लगीं। नज़रें पहले से कहीं अधिक स्थिर हो गई थीं। अब सब कुछ साफ दिखाई दे रहा था।

नदी के इस किनारे भी मैं था, और नदी के उस किनारे भी मैं ही खड़ा था। वहाँ हम दोनों थे, और हमारे बीच कोई तीसरा नहीं था। पहली बार हम बिना किसी शोर, बिना किसी हस्तक्षेप के एक-दूसरे को सुन पा रहे थे। जो बातें वर्षों से भीतर कैद थीं, वे आज शब्द बनकर बहने लगी थीं।
हर आती-जाती साँस के साथ मैं अपनी सफलताओं, अपनी असफलताओं, अपने सही-गलत निर्णयों और अपने इरादों को नए सिरे से देख पा रहा था। शायद यह सन्नाटा न होता, तो नदी के उस पार खड़ा मेरा दूसरा रूप कभी इस पार खड़े मुझसे मिल ही नहीं पाता। दिन के उजाले में, एक-दूसरे के इतने करीब होकर भी, हम दोनों कभी मिल नहीं सके।

शायद इसलिए कि दिन की चकाचौंध में हम अपने चेहरे पर सफेदी का एक चोला ओढ़े रहते हैं। दुनिया के सामने स्वयं को निर्दोष, सफल और संतुलित दिखाने की कोशिश में अपने ही भीतर के व्यक्ति को भूल जाते हैं। अपनी गलतियाँ, अपने अधूरे सच, अपने सही-गलत इरादे—सब उस सफेद चादर के नीचे छिपा देते हैं, जहाँ हमारी आत्मा की अनकही कहानी साँस ले रही होती है।
लेकिन कभी-कभी ऐसी कोई रात आती है, जब चारों ओर फैला सन्नाटा हमारे भीतर का शोर सुनने लगता है। तब न कोई मुखौटा बचता है, न कोई दिखावा। केवल हम होते हैं… और हमारे सामने खड़ा हमारा अपना सच।

शायद कुछ रास्ते दुनिया की ओर नहीं जाते; वे हमें हमारे ही भीतर ले जाते हैं।जीते तो हम सब हैं—कई मुखौटे पहनकर, कई सच ओढ़कर और कई सच छिपाकर। सबसे भयावह बात यह नहीं कि दुनिया हमें नहीं पहचानती, बल्कि यह है कि दिन के उजाले में हम स्वयं ही अपने आप से मिलने का साहस नहीं कर पाते। दुनिया हमें जिस रूप में देखना चाहती है, हम वैसा ही दिखते रहते हैं।कभी-कभी सोचता हूँ… आख़िर मैं अपने ही लिए कितना डरावना हो गया होऊँगा कि दिन के उजाले में कभी अपने आप से मिल ही नहीं पाया। शायद इसलिए रात का सन्नाटा मुझे अपना लगता है, क्योंकि वहीं नदी के उस पार खड़ा मेरा असली स्वरूप बिना किसी मुखौटे के मेरा इंतज़ार करता है। तब एहसास होता है कि दुनिया तक पहुँचने से पहले अपने भीतर तक पहुँचना कितना ज़रूरी है। शायद जीवन की सबसे लंबी यात्रा किसी मंज़िल तक नहीं, बल्कि स्वयं तक पहुँचने की यात्रा होती है।
लेकिन शायद सच यही है कि हम सब जीते तो हैं, कुछ मुखौटे पहनकर और कुछ सफ़ेद चादरें ओढ़कर। दुनिया हमें जिस रूप में देखना चाहती है, हम वैसा ही दिखते रहते हैं। सोचता हूँ… आख़िर मैं अपने ही लिए कितना डरावना हो गया होऊँगा, कि दिन के उजाले में कभी अपने आप से मिल ही नहीं पाया। शायद इसलिए रात का सन्नाटा मुझे अच्छा लगता है, क्योंकि वहीं नदी के उस पार खड़ा मेरा असली स्वरूप बिना किसी मुखौटे के मेरा इंतज़ार करता है। और तब समझ आता है कि दुनिया तक पहुँचने से पहले, अपने भीतर तक पहुँचना कितना ज़रूरी है।
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