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  • जब रास्तों पर चलना हो,तो सवाल करिए—कभी खुद से,कभी रास्तों से सवाल करिए।डगर-डगर की अपनी मंज़िल है,हर मोड़ का अपना अर्थ;इसलिए सफ़र में सवाल करिए,कहीं ऐसा न होकि चलते-चलतेआप खुद को ही खो दें।यूँ चलते हुएइन रातों में, इन रास्तों पर,एक दिन कहीं पहुँच ही जाओगे।मगर सवाल यह है—क्या लेकर पहुँचोगे?यह बताएगाकि रास्ते में तुमनेसवाल…

  • कुछ महीने पहले मेरा तबादला नागालैंड में हुआ और मैं मेडजिफेमा नाम के एक छोटे-से शहर के पास रहने लगा। यहां आने के बाद एक दिन पहली बार बाजार गया। बाजार में घूमते हुए अचानक लगा जैसे मैं किसी अनजानी जगह नहीं, बल्कि अपने बचपन के किसी पुराने बाजार में लौट आया हूं।ऐसा कभी सोचा…

  • भरम था मुझेकि वो अपने हैं,ये गाँव अपना है,ये लोग अपने हैं,ये साँसें मेरी हैं,ये परछाई मेरी है।भरम टूटाजब धूप कठोर हुई,सूरज सीधे सिर के ऊपर था।तपिश बढ़ी तो अहसास हुआ—परछाई भीधीरे-धीरे मुझमें लीन हो रही है,जाने क्योंअब उसी तपती धूप से डर रही है।जब समय का पहिया घूमा,ज़िंदगी ने सवाल किए,हर तरह की परीक्षा…

  • काली कोयल, काला कौवा—दोनों का रंग एक है,फिर भी एक की वाणी सम्मान पाती हैऔर दूसरे की आवाज़ को हम कर्कश कहकर भुला देते हैं।मंद-मंद बहती हुई हवा,ठंडी-सी शाम,इन पहाड़ों पर तैरते हुए बादलऔर उनके बीच आती-जाती धूप—जब प्रकृति अपनी ही धुन में लुका-छिपी खेल रही होती है,तब जाने क्यों मुझे लगता है—कौवा भी काला…

  • अंधियारा है जी।रिश्तों के बीच उठते-बैठते तूफानों ने जब जीवन को चारों ओर से घेर लिया है ना बाबू, तो ऐसा लगता है जैसे हर तरफ रोशनी होते हुए भी सब कुछ डूब सा गया हो। आँखें तो हैं, खुली भी रहती हैं, मगर उन आँखों के सामने जो दर्द खड़ा होता है, उसे समझने…

  • आज फिर सुबह का सूरज अपनी यात्रा पूरी करते-करते पश्चिम में कहीं खो गया और सांझ चुपचाप रात में बदल गई। दिन तो काम, दोस्तों और घर-परिवार के बीच कब बीत गया, पता ही नहीं चला। लेकिन जैसे-जैसे रात गहराती गई, धुंधली और खोई हुई यादें एक-एक करके स्पष्ट होने लगीं। नज़रें पहले से कहीं…

  • It has always been my desire to write about this subject. When I started my first blog, I had many thoughts that I wanted to share. However, due to a lack of time and other priorities, I stopped writing and eventually quit blogging. Today, I have decided to return—not because I have more time, but…

  • फुटबॉल के मैदान पर अंतिम सीटी केवल नब्बे मिनट के खेल का अंत नहीं करती; कभी-कभी वह एक पूरे युग पर भी विराम लगा देती है। कुछ क्षण आँकड़ों में दर्ज नहीं होते, फिर भी इतिहास बन जाते हैं। वे हमें यह याद दिलाते हैं कि समय हर खिलाड़ी से उसका खेल छीन सकता है,…

  • जंतर-मंतर की गूँज: संवाद, लोकतंत्र और जनविश्वास

    “लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति सत्ता नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है; और विश्वास की सबसे मजबूत नींव संवाद है।” दिल्ली का जंतर-मंतर केवल एक प्रदर्शन स्थल नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की जीवंत चेतना का प्रतीक है। स्वतंत्र भारत में यह वह सार्वजनिक मंच रहा है, जहाँ किसान, छात्र, कर्मचारी, महिलाएँ, पर्यावरण कार्यकर्ता, सामाजिक…