मेरा जन्म 1985 में हुआ। यूँ कहें कि मैंने एक दौर देखा है—इन चार दशकों में देश को बदलते हुए देखा है। थोड़ी-बहुत चुनावी समझ शायद घर के माहौल से आई, शायद घरों और मोहल्लों में होने वाली चर्चाओं से, और शायद उन समाचार-पत्रों से जिन्हें पढ़ते हुए धीरे-धीरे देश और राजनीति को समझने की कोशिश शुरू हुई। 10–13 वर्ष की उम्र से ही चुनाव और राजनीति को लेकर कुछ बातें समझ आने लगी थीं। फिर पहली बार मतदान करने का अवसर आया। अपना मत अटल जी की सरकार को दिया। शायद इसलिए कि वे अच्छे वक्ता थे और उनकी बातें सुनना अच्छा लगता था। उस समय मतदान का आधार कोई बहुत गहरी राजनीतिक समझ नहीं थी, लेकिन एक विश्वास जरूर था कि जिसे सुनकर अच्छा लगता है, शायद वह अच्छा काम भी करेगा।

वक्त बदला, दौर बदला। सरकारें बदलीं, पक्ष बदले, विपक्ष बदले। लेकिन चुनावी तौर-तरीकों में बहुत कुछ वैसा ही रहा। अब केवल इतना बदलाव आया है कि सोशल मीडिया भी चुनावी लड़ाई का एक बड़ा मैदान बन चुका है।

मुद्दे आज भी हैं। जनता उन्हें जानती है, मांगती है और सवाल भी करती है।

कुछ सवाल यदि दिल्ली तक पहुँच जाएँ तो शायद सुन लिए जाएँ, लेकिन अधिकतर सवाल रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं—या कई बार उन्हें अलग-अलग तरीकों से मार दिया जाता है। उन तरीकों पर चर्चा करना इस लेख का विषय नहीं है।

मैं एक दूसरे सवाल पर रुकना चाहता हूँ—

सत्ता से सवाल करना कितना जायज़ है, यदि मतदान के समय हमने खुद मुद्दों को पीछे छोड़ दिया था?

जब जाति और धर्म को मुद्दों से ऊपर रखकर मतदान किया गया, जब कहीं पैसा, शराब, मुर्गा या किसी दूसरे प्रलोभन के बदले मत दे दिया गया, तब उन लोगों का क्या जिन्होंने अपने मत को सचमुच मुद्दों के आधार पर इस्तेमाल किया?

यह सवाल किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने के लिए नहीं है। यह सवाल हम सभी के सामने है।

आज के दौर में अधिकतर मतदान कितने मुद्दों पर होता है, यह अपने आप में एक बड़ा प्रश्न है। राजनीतिक दल घोषणा-पत्र जरूर जारी करते हैं, लेकिन चुनावी भाषणों में अक्सर उन घोषणाओं से अधिक व्यक्तिगत टिप्पणियाँ, आरोप-प्रत्यारोप और पुराने विवाद दिखाई देते हैं।

क्यों?

क्योंकि विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि, महँगाई और भविष्य की योजनाएँ शायद उतना चुनावी मसाला पैदा नहीं करतीं, जितना कोई विवादित बयान कर सकता है।

मुद्दे धीरे-धीरे पीछे चले जाते हैं।

और जब मुद्दे पीछे जाते हैं, तो सवाल भी पीछे चले जाते हैं।

इस पूरे बदलाव में हमारी शिक्षा व्यवस्था, हमारी राजनीतिक संस्कृति और हमारे संचार माध्यमों—सभी की कुछ न कुछ भूमिका रही है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें हम नागरिकों की भी भूमिका है।

हम वही देखते हैं जो हमें दिखाया जाता है, वही चर्चा करते हैं जिसकी सबसे अधिक चर्चा होती है और कई बार उसी को महत्वपूर्ण मान लेते हैं जिसे सबसे ज्यादा शोर मिलता है।

शायद यही हमारी सबसे बड़ी विडंबना है।

हमारे पास सूचना पहले से कहीं अधिक है, लेकिन क्या हमारी राजनीतिक समझ भी उतनी ही बढ़ी है?

यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जब समाज की शैक्षणिक और बौद्धिक समझ कमजोर होती है, तब गंभीर मुद्दों को भी कई छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटकर इस तरह प्रस्तुत किया जा सकता है कि अंत में अर्थ का अनर्थ हो जाए।

एक बयान पूरे मुद्दे पर भारी पड़ जाता है।

एक विवाद विकास की चर्चा को निगल जाता है।

और एक भावनात्मक नारा वर्षों की नीतिगत बहस पर भारी पड़ जाता है।

आज Gen Z का समय है। नई पीढ़ी के पास सूचना के साधन पहले से कहीं अधिक हैं। उसके पास सवाल पूछने के लिए सोशल मीडिया है और अपनी बात रखने के लिए अनेक मंच हैं।

लेकिन आने वाला समय बताएगा कि इनमें से कितने लोग मतदान करते समय वास्तव में मुद्दों को जाति, धर्म, भावनात्मक नारों और छोटे-छोटे प्रलोभनों से ऊपर रख पाएँगे।

क्योंकि यदि हमें मुद्दे चाहिए, काम चाहिए और जवाब चाहिए, तो शुरुआत मतदान से करनी होगी।

मुद्दों पर मतदान कीजिए।

ऐसे लोगों को चुनकर भेजिए जो शिक्षित हों, सक्षम हों, आपकी बात समझ सकें और उसे सदन तक पहुँचाने का साहस रखते हों।

और सबसे महत्वपूर्ण—

अपने मत को किसी लालच या प्रलोभन के बदले मत बेचिए।

क्योंकि मतदान केवल पाँच साल में एक बार किया जाने वाला अधिकार नहीं है; यह अगले पाँच वर्षों के लिए सत्ता को जवाबदेह बनाने की पहली सीढ़ी है।

इसे एक सरल उदाहरण से समझिए।

यदि हमने गलत बीज चुना, उसे बोया और फिर अच्छी फसल की उम्मीद की, तो परिणाम पर आश्चर्य कैसा?

जिस बीज में ही हमारी प्राथमिकताएँ गलत थीं, उससे निकली फसल में भी वही दिखाई देगी।

इसीलिए किसी प्रलोभन में दिया गया मत आपके लोकतांत्रिक अधिकार को समाप्त नहीं करता। आपको सवाल पूछने का अधिकार फिर भी रहता है। लेकिन वह आपके नैतिक और वैचारिक दावे को कमजोर जरूर करता है।

क्योंकि तब सवाल केवल सत्ता से नहीं, स्वयं से भी पूछना पड़ता है—

मैंने उसे चुना ही क्यों था?

और यदि आपने सवाल पूछ भी लिया, तो क्या वह सवाल उतनी ही मजबूती से खड़ा रहेगा, जब आपका मत किसी जाति, धर्म, रिश्ते, पैसे या प्रलोभन से प्रभावित था?

जिसे आपने चुना, क्या वह आपका सवाल सुनेगा?

या उसे अनसुना कर देगा?

शायद यह भी हमारे संबंधों, हमारी अपेक्षाओं और हमारे मतदान के कारणों पर निर्भर करता है।

इसलिए सवालों की मौन हत्या हमेशा सत्ता नहीं करती।

कभी-कभी सवाल पैदा होने से पहले ही उनकी आवाज़ हम स्वयं छीन लेते हैं।

सत्ता से सवाल करना लोकतंत्र की ताकत है।

लेकिन सत्ता से सवाल करने से पहले एक सवाल स्वयं से भी होना चाहिए—

मैंने अपना मत किसे दिया था, क्यों दिया था, और उसके बदले मैंने अपने लोकतंत्र से क्या उम्मीद की थी?

शायद लोकतंत्र की असली शुरुआत यहीं से होती है।

सत्ता से सवाल करने से पहले,
अपने मत से सवाल कीजिए।

लेखकीय टिप्पणी: इस लेख का मूल विचार एवं भाव लेखक के स्वयं के हैं; भाषा, प्रवाह और प्रस्तुति को बेहतर बनाने में AI की सहायता ली गई है।

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