अंधियारा है जी।रिश्तों के बीच उठते-बैठते तूफानों ने जब जीवन को चारों ओर से घेर लिया है ना बाबू, तो ऐसा लगता है जैसे हर तरफ रोशनी होते हुए भी सब कुछ डूब सा गया हो। आँखें तो हैं, खुली भी रहती हैं, मगर उन आँखों के सामने जो दर्द खड़ा होता है, उसे समझने या थामने वाला कोई नहीं होता।

ये रिश्तों के ही तूफान होते हैं जी, जो कभी अंदर ही अंदर इंसान को तोड़ देते हैं, तो कभी बाहर से इतनी जोर से घेर लेते हैं कि बचने की कोई राह ही नहीं बचती। और फिर इंसान हर तरफ से अकेला पड़ जाता है।बस जीना होता है… किसी तरह साँसों को चलते रखना होता है, चाहे भीतर कितना ही कोलाहल क्यों न मचा हो।क्योंकि जब जिंदगी की नाव इन रिश्तों के तूफानों में फँसकर गहरे अंधकार में डूब जाती है ना, तो सूरज सिर के ऊपर चमक रहा होता है, चारों ओर उजाला फैला होता है, फिर भी कुछ दिखाई नहीं देता।आप ठीक होते हैं, लेकिन खड़े नहीं हो पाते।रास्ते सामने होते हैं, मगर कदम आगे नहीं बढ़ते। और कभी-कभी चलते-चलते इंसान खुद को ही कहीं पीछे छोड़ आता है।शायद रिश्तों के तूफानों की सबसे बड़ी मार यही है—वे हमें दूसरों से दूर करते-करते कभी-कभी हमसे ही दूर कर देते हैं।आज फिर सुबह हुई थी।सूरज निकला था। लगा था शायद आज कुछ बदलेगा। लेकिन रात होते-होते फिर वही अंधियारा लौट आया।मैं इस उजाले के बीच भी अंधेरों से घिरा, किसी उम्मीद की तलाश में बैठा रहा।शायद कोई साथ हो।शायद कोई आवाज़ दे।शायद कोई बस इतना कह दे— “मैं हूँ।”लेकिन खामोशी इतनी गहरी थी कि शायद किसी ने पुकारा भी हो, तो मैं सुन नहीं पाया।जाने जिंदगी का ये चक्कर कब तक चलेगा?कब निकलेगी सुबह?कब खिलेंगे फूल?कब होंगी ये साँसें फिर से ज़िंदा?कभी-कभी सोचता हूँ, अगर जिंदगी भी हर महीने रिचार्ज करवाने पर चलती होती ना, तो कुछ महीनों का रिचार्ज ही नहीं करवाता।बस कहीं चुपचाप बैठ जाता।न शिकायत, न सवाल।लेकिन फिर मन के किसी कोने से एक आवाज़ आती है—“इतनी जल्दी हार मत मान।”शायद अंधेरा कितना भी गहरा हो, कहीं न कहीं कोई छोटी-सी रोशनी बची रहती है।शायद जिंदगी का मतलब हर दिन उजाला पाना नहीं, बल्कि अंधेरे में भी अपने भीतर की उस रोशनी को बचाए रखना है।और शायद एक दिन हम अपने ही दो पैरों पर खड़े होकर कह पाएँगे—“अंधियारा बहुत था…लेकिन मैं फिर भी जी गया।”
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