भरम था मुझे कि वो अपने हैं, ये गाँव अपना है, ये लोग अपने हैं, ये साँसें मेरी हैं, ये परछाई मेरी है।
भरम टूटा जब धूप कठोर हुई, सूरज सीधे सिर के ऊपर था। तपिश बढ़ी तो अहसास हुआ— परछाई भी धीरे-धीरे मुझमें लीन हो रही है, जाने क्यों अब उसी तपती धूप से डर रही है।
जब समय का पहिया घूमा, ज़िंदगी ने सवाल किए, हर तरह की परीक्षा ली। अब जाने इस दौर में कौन-कौन परखा गया।
सब छूटे एक के बाद एक— कोई आगे निकल गया, कोई पीछे छूट गया, और कोई रास्ते में ही कहीं खो गया।
अब तो साँसें भी उधार की लग रही हैं।
कल तक जो अपने थे, आज उनकी छाया भी अजनबी लग रही है।
यही भरम था, इन्हीं पर गुमान था।
सूरज तपता रहा, ज़िंदगी एक दौर से दूसरे दौर में गुजरती रही, और जाने कहाँ-कहाँ रास्ते बदलते रहे।
पता ही नहीं चला कि कब अपने ही पराए हो चले।
अब साँसें ही थीं— जाने कब तक साथ रहतीं। अब तो ये भी पराए होने का एहसास करा देती हैं, ये भी उधार-सी लगती हैं, जाने कब साथ छोड़ जाएँ।
फिर मन कहता है—
भरम में था, भरम में ही रहने दो।
क्यों कुछ क्षण के लिए आँखें खोलूँ, और जानूँ कि इस भरम के पार क्या है?
जो जैसा है, उसे वैसा ही रहने दो।
हर सच को जानना भी ज़रूरी तो नहीं।
कभी-कभी एक भरम ही ज़िंदगी को ज़िंदगी जैसा बनाए रखता है। लेखकीय टिप्पणी: इस लेख का मूल विचार एवं भाव लेखक के स्वयं के हैं; भाषा, प्रवाह और प्रस्तुति को बेहतर बनाने में AI की सहायता ली गई है।
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