जब रास्तों पर चलना हो,
तो सवाल करिए—
कभी खुद से,
कभी रास्तों से सवाल करिए।
डगर-डगर की अपनी मंज़िल है,
हर मोड़ का अपना अर्थ;
इसलिए सफ़र में सवाल करिए,
कहीं ऐसा न हो
कि चलते-चलते
आप खुद को ही खो दें।
यूँ चलते हुए
इन रातों में, इन रास्तों पर,
एक दिन कहीं पहुँच ही जाओगे।
मगर सवाल यह है—
क्या लेकर पहुँचोगे?
यह बताएगा
कि रास्ते में तुमने
सवाल किए थे या नहीं।
मंज़िल तक खुद पहुँचे,
या अनजाने में पहुँचा दिए गए—
यह भी एक सवाल है।
और शायद
इन्हीं सवालों के बीच
जीवन का असली अर्थ छिपा है।
क्योंकि मंज़िल तक पहुँचना ही
सफ़र की सफलता नहीं है;
सवाल यह भी है
कि रास्तों ने तुम्हें
क्या बनाया।
अबोध बनकर निकले थे घर से,
मंज़िल की तलाश में।
क्या रास्तों से गुजरते हुए
कुछ बोध पाया?
क्या तुम बोधी बनकर पहुँचे,
या अब भी अबोध ही रहे?
कहीं ऐसा तो नहीं
कि शरीर मंज़िल तक पहुँच गया,
मगर मन
रास्ते में ही कहीं छूट गया।
कहीं ऐसा तो नहीं
कि जिंदा तो पहुँच गए,
पर भीतर से
जिंदा नहीं थे।
सब रास्तों और सवालों का ही फेर है—
पूछकर चले या बिना पूछे,
ठहरकर चले या बस चलते रहे।
कहाँ पहुँचे,
कैसे पहुँचे,
और क्या बनकर पहुँचे—
यह शायद सिर्फ़ तुम जानते हो,
या वह ईश्वर
जो हर रास्ते का साक्षी है।
इसलिए—
पूछो सवाल,
पूछ सको तो।
खुद से भी,
इन रास्तों से भी।
शायद हर सवाल
मंज़िल का रास्ता न बताए,
लेकिन कोई सवाल
तुम्हें तुम्हारा रास्ता बता दे।
और शायद किसी मोड़ पर
मंज़िल का पता न मिले—
पर खुद का पता मिल जाए।
शायद
यही किसी सफ़र की
सबसे बड़ी मंज़िल हो।
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