कुछ महीने पहले मेरा तबादला नागालैंड में हुआ और मैं मेडजिफेमा नाम के एक छोटे-से शहर के पास रहने लगा। यहां आने के बाद एक दिन पहली बार बाजार गया। बाजार में घूमते हुए अचानक लगा जैसे मैं किसी अनजानी जगह नहीं, बल्कि अपने बचपन के किसी पुराने बाजार में लौट आया हूं।ऐसा कभी सोचा नहीं था कि जिंदगी मुझे इतने वर्षों बाद मेरे बचपन के बाजार से फिर मिला देगी। लेकिन ऐसा हुआ और आज उसी अनुभव को लिख रहा हूं।बाजार से मेरी पहली मुलाकात मेरे पापा ने कराई थी। उनकी साइकिल पर बैठकर मैं अपने शहर के पहाड़ों के बीच बसे बाजार जाया करता था। पापा खरीदारी करते और मैं गुलाब जामुन के फेर में रहता। उस उम्र में मेरे लिए बाजार शायद यही था—पापा की साइकिल, पहाड़ों के बीच की चहल-पहल और गुलाब जामुन।फिर पापा की बदली हो गई और हम एक नई जगह चले गए। अब मेरी उम्र भी थोड़ी बड़ी हो गई थी, इसलिए स्कूल जाने लगा था। एक छोटे-से गांव में हमारा स्कूल था और स्कूल के सामने ही सप्ताह में एक दिन बाजार लगता था।बाजार छोटा था, लेकिन जरूरत की लगभग हर चीज मिल जाती थी, खासकर साग-सब्जी। गांव में वैसे तो घर की बड़ी में ही बहुत कुछ उग जाता था, फिर भी बाजार की अपनी एक अलग जगह थी। सप्ताह में एक दिन लगने वाला वह छोटा-सा बाजार पूरे गांव को जैसे एक जगह इकट्ठा कर देता था।शायद बाजार से मेरी असली पहचान वहीं हुई।फिर समय आगे बढ़ा और हम एक और जगह चले गए। वहां रोज लगने वाली सब्जियों की दुकानें तो थीं, लेकिन मंगलवार के बाजार का अपना ही जलवा था। हर मंगलवार स्कूल जल्दी छूट जाता था। उस दिन का इंतजार शायद बाजार के लिए कम और जल्दी छूटने वाले स्कूल के लिए ज्यादा होता था, लेकिन यादों में दोनों एक साथ हैं।आसपास इतना बड़ा बाजार भी नहीं था। इसलिए मंगलवार का बाजार धीरे-धीरे मेरे बचपन का एक हिस्सा बन गया।समय बीतता गया। रोज लगने वाली गुजरी का अपना रुतबा बढ़ता गया और मंगलवार का बाजार धीरे-धीरे फीका पड़ता गया। शायद आज भी लगता हो, लेकिन घर से दूर हूं और कई वर्षों से वहां जाना नहीं हुआ।कभी किसी ने सोचा था कि उम्र के 41 बसंत देख चुका मैं एक दिन फिर अपने बचपन के उसी एहसास से मिल पाऊंगा—वह भी नागालैंड के इन पहाड़ों के बीच?मेडजिफेमा के बाजार में पहुंचकर कुछ ऐसा ही लगा।बाजार वही नहीं था, जगह वही नहीं थी, लोग भी वही नहीं थे। फिर भी कुछ था जो बहुत अपना-सा था। लोगों की आवाजाही, दुकानों की चहल-पहल, साग-सब्जियों से भरी दुकानें और बाजार के बीच चलती हुई जिंदगी—इन सबमें कहीं मेरा बचपन खड़ा था।दिल में एक अजीब-सा सुकून था।और सबसे खूबसूरत बात यह कि अब मैं अपने बेटे के साथ बाजार जाता हूं।कभी मेरे पापा मुझे बाजार लेकर जाते थे। तब मैं उनकी साइकिल पर बैठा रहता था और बाजार से ज्यादा मेरी नजर गुलाब जामुन पर होती थी। आज वही बाजार मैं अपने बेटे को दिखा रहा हूं।समय जैसे एक पूरा चक्कर लगाकर मेरे सामने खड़ा हो गया है।पापा ने मुझे बाजार से मिलवाया था, आज मैं अपने बेटे को बाजार से मिला रहा हूं।लेकिन मन में एक सवाल भी आता है—क्या मेरा बेटा कभी अपने बच्चों को ऐसा कोई बाजार दिखा पाएगा?कौन जानता है।दुनिया बदल रही है और जिंदगी भी हर दिन अपना रूप बदल रही है। हो सकता है आने वाले समय में बाजार तो रहें, लेकिन वे बाजार न रहें जिनमें खरीदारी से ज्यादा मुलाकातें होती थीं, सामान से ज्यादा यादें मिलती थीं और जहां सप्ताह में एक दिन पूरे गांव की धड़कन सुनाई देती थी।शायद मैं खुशकिस्मत हूं कि जिंदगी ने मुझे एक बार फिर पीछे मुड़कर देखने का मौका दिया।बचपन वापस नहीं आता। लेकिन कभी कोई बाजार, कोई रास्ता, कोई खुशबू या किसी अनजान जगह का कोई दृश्य हमें अचानक उसी समय में ले जाता है, जहां हम बहुत पहले पीछे कुछ छोड़ आए थे।मेरे लिए मेडजिफेमा का वह बाजार सिर्फ एक बाजार नहीं था।वह मेरे बचपन से मेरी फिर हुई एक मुलाकात थी।

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